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आदि पर्व
अध्याय १०५
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वैशम्पाय़न उवाच
शन्तनो राजसिंहस्य भरतस्य च धीमतः |  २०   क
प्रनष्टः कीर्तिजः शव्दः पाण्डुना पुनरुद्धृतः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति