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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
ग्रामे गृहे वा यद्द्रव्यं पारक्यं विजने स्थितम् |  ३१   क
नाभिनन्दन्ति वै नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति