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शान्ति पर्व
अध्याय ६२
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भीष्म उवाच
क्षात्राणि वैश्यानि च सेवमानः; शौद्राणि कर्माणि च व्राह्मणः सन् |  ४   क
अस्मिँल्लोके निन्दितो मन्दचेताः; परे च लोके निरय़ं प्रय़ाति ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति