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शान्ति पर्व
अध्याय १५९
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भीष्म उवाच
काले चतुर्थे भुञ्जानो व्रह्मचारी व्रती भवेत् |  ५६   क
स्थानासनाभ्यां विहरेत्त्रिरह्नोऽभ्युदितादपः |  ५६   ख
एवमेव निराचान्तो यश्चाग्नीनपविध्यति ||  ५६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति