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वन पर्व
अध्याय १५९
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वैश्रवण उवाच
यथा जिष्णुर्महेन्द्रस्य यथा वाय़ोर्वृकोदरः |  १५   क
धर्मस्य त्वं यथा तात योगोत्पन्नो निजः सुतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति