वन पर्व  अध्याय १५९

वैश्रवण उवाच

न मोहात्कुरुते जिष्णुः कर्म पाण्डव गर्हितम् |  २०   क
न पार्थस्य मृषोक्तानि कथय़न्ति नरा नृषु ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति