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द्रोण पर्व
अध्याय १५९
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सञ्जय़ उवाच
स्वप्नाय़मानास्त्वपरे परानिति विचेतसः |  १८   क
आत्मानं समरे जघ्नुः स्वानेव च परानपि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति