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द्रोण पर्व
अध्याय १५९
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सञ्जय़ उवाच
संमर्द्यान्ये रणे केचिन्निद्रान्धाश्च परस्परम् |  २०   क
जघ्नुः शूरा रणे राजंस्तस्मिंस्तमसि दारुणे ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति