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द्रोण पर्व
अध्याय १५९
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सञ्जय़ उवाच
तेषामेतादृशीं चेष्टां विज्ञाय़ पुरुषर्षभः |  २२   क
उवाच वाक्यं वीभत्सुरुच्चैः संनादय़न्दिशः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति