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द्रोण पर्व
अध्याय १५९
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सञ्जय़ उवाच
त्वं हि द्रोणविनाशाय़ समुत्पन्नो हुताशनात् |  ३   क
सशरः कवची खड्गी धन्वी च परतापनः |  ३   ख
अभिद्रव रणे हृष्टो न च ते भीः कथञ्चन ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति