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द्रोण पर्व
अध्याय १५९
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सञ्जय़ उवाच
इति ते तं नरव्याघ्रं प्रशंसन्तो महारथाः |  ३४   क
निद्रय़ा समवाक्षिप्तास्तूष्णीमासन्विशां पते ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति