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द्रोण पर्व
अध्याय १५९
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सञ्जय़ उवाच
अश्वपृष्ठेषु चाप्यन्ये रथनीडेषु चापरे |  ३५   क
गजस्कन्धगताश्चान्ये शेरते चापरे क्षितौ ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति