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द्रोण पर्व
अध्याय १५९
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सञ्जय़ उवाच
जनमेजय़ः शिखण्डी च दौर्मुखिश्च यशोधनः |  ४   क
अभिद्रवन्तु संहृष्टाः कुम्भय़ोनिं समन्ततः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति