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द्रोण पर्व
अध्याय १५९
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सञ्जय़ उवाच
प्रतिप्रकाशिते लोके दिवाभूते निशाकरे |  ४७   क
विचेरुर्न विचेरुश्च राजन्नक्तञ्चरास्ततः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति