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शल्य पर्व
अध्याय ४९
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वैशम्पाय़न उवाच
मित्रावरुणय़ोर्लोकानादित्यानां तथैव च |  ३८   क
सलोकतामनुप्राप्तमपश्यत ततोऽसितः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति