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सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
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वैशम्पाय़न उवाच
तं गृहीत्वा ततो राजा शिरस्येवाकरोत्तदा |  ३४   क
गुरोरुच्छिष्टमित्येव द्रौपद्या वचनादपि ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति