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सौप्तिक पर्व
अध्याय १६
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो दिव्यं मणिवरं शिरसा धारय़न्प्रभुः |  ३५   क
शुशुभे स महाराजः सचन्द्र इव पर्वतः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति