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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
अकार्यं कृतवानस्मि रागद्वेषवलात्कृतः |  ६   क
इत्युक्त्वा वहुशो विद्वान्ग्रामं भैक्षाय़ संश्रितः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति