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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मार्थकामाः सममेव सेव्या; यस्त्वेकसेवी स नरो जघन्यः |  ३८   क
द्वय़ोस्तु दक्षं प्रवदन्ति मध्यं; स उत्तमो यो निरतस्त्रिवर्गे ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति