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द्रोण पर्व
अध्याय १४८
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वासुदेव उवाच
तस्मिन्नस्त्राणि दिव्यानि राक्षसान्यासुराणि च |  ३६   क
सततं चानुरक्तो वो हितैषी च घटोत्कचः |  ३६   ख
विजेष्यति रणे कर्णमिति मे नात्र संशय़ः ||  ३६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति