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स्त्री पर्व
अध्याय १६
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्कृत्तशिरसश्चान्यान्विजग्धान्मृगपक्षिभिः |  ५३   क
दृष्ट्वा काश्चिन्न जानन्ति भर्तॄन्भरतय़ोषितः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति