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शान्ति पर्व
अध्याय १६
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रव्राजनं च नगरादजिनैश्च निवासनम् |  १८   क
महारण्यनिवासश्च न तस्य स्मर्तुमर्हसि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति