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अनुशासन पर्व
अध्याय १६
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वासुदेव उवाच
त्वत्तः प्रवर्तते कालस्त्वय़ि कालश्च लीय़ते |  १७   क
कालाख्यः पुरुषाख्यश्च व्रह्माख्यश्च त्वमेव हि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति