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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
जय़द्रथे च निहते राक्षसे चाप्यलाय़ुधे |  २७   क
वाह्लिके सोमदत्ते च नैवाशाम्यत वैशसम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति