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अनुशासन पर्व
अध्याय १६
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वासुदेव उवाच
अष्टौ प्रकृतय़श्चैव प्रकृतिभ्यश्च यत्परम् |  ५४   क
अस्य देवस्य यद्भागं कृत्स्नं सम्परिवर्तते ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति