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अनुशासन पर्व
अध्याय १६
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वासुदेव उवाच
इय़ं सा परमा शान्तिरिय़ं सा निर्वृतिः परा |  ५८   क
यं प्राप्य कृतकृत्याः स्म इत्यमन्यन्त वेधसः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति