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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
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व्राह्मण उवाच
चरन्तं मुक्तवत्सिद्धं प्रशान्तं संय़तेन्द्रिय़म् |  २१   क
दीप्यमानं श्रिय़ा व्राह्म्या क्रममाणं च सर्वशः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति