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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
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व्राह्मण उवाच
भृशं प्रीतोऽस्मि भवतश्चारित्रेण विचक्षण |  ४२   क
परिपृच्छ यावद्भवते भाषेय़ं यत्तवेप्सितम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति