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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
भीष्मो वः समरे सर्वान्पलय़िष्यति धर्मवित् |  १०३   क
ते भय़ं सुमहत्त्वक्त्वा पाण्डवान्प्रतिय़ुध्यत ||  १०३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति