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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
कृत्स्ना ह्यक्षौहिणी राजन्सव्यसाची च पाण्डवः |  ३०   क
तमसा संवृते लोके नादृश्यत महाहवे ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति