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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
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व्राह्मण उवाच
गुरुर्मतो भवानस्य कृत्स्नस्य जगतः प्रभुः |  १०   क
धर्मात्मानमतस्तुभ्यमनुजानीमहे सुतम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति