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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
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व्राह्मण उवाच
प्राप्स्यते च भवान्पुण्यं धर्मे च परमां स्थितिम् |  १२   क
वेद पुण्यं च कार्त्स्न्येन सम्यग्भरतसत्तम ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति