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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
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व्राह्मण उवाच
दीर्घदर्शी कृतप्रज्ञः सदा वैश्रवणो यथा |  १६   क
अक्षुद्रसचिवश्चाय़ं कुन्तीपुत्रो महामनाः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति