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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
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वैशम्पाय़न उवाच
धृतराष्ट्रश्च तद्वाक्यमभिपूज्य पुनः पुनः |  २५   क
विसर्जय़ामास तदा सर्वास्तु प्रकृतीः शनैः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति