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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
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व्राह्मण उवाच
यद्विनष्टाः कुरुश्रेष्ठा राजानश्च सहस्रशः |  ९   क
सर्वं दैवकृतं तद्वै कोऽत्र किं वक्तुमर्हति ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति