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वन पर्व
अध्याय २०५
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व्राह्मण उवाच
पतिव्रताय़ाः सत्याय़ाः शीलाढ्याय़ा यतव्रत |  ४   क
संस्मृत्य वाक्यं धर्मज्ञ गुणवानसि मे मतः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति