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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
इदमभ्यधिकं राजन्व्राह्मणा गुरवश्च ते |  ७३   क
समेताः कथय़न्तीह मुदिताः सत्यसन्धताम् ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति