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द्रोण पर्व
अध्याय ३५
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽभिमन्युः प्रहसन्सारथिं वाक्यमव्रवीत् |  ५   क
सारथे को न्वय़ं द्रोणः समग्रं क्षत्रमेव वा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति