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सभा पर्व
अध्याय १६
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वासुदेव उवाच
एको ह्येव श्रिय़ं नित्यं विभर्ति पुरुषर्षभ |  ८   क
अन्तरात्मेव भूतानां तत्क्षय़े वै वलक्षय़ः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति