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सभा पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
ये चान्ये तत्र राजानः पूर्वमेव समागताः |  २५   क
जय़द्रथेन च तथा कुरुभिश्चापि सर्वशः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति