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विराट पर्व
अध्याय १६
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वैशम्पाय़न उवाच
सुखं वा यदि वा दुःखं द्वेष्यं वा यदि वा प्रिय़म् |  १४   क
यथावत्सर्वमाचक्ष्व श्रुत्वा ज्ञास्यामि यत्परम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति