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विराट पर्व
अध्याय १६
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वैशम्पाय़न उवाच
अहमेव हि ते कृष्णे विश्वास्यः सर्वकर्मसु |  १५   क
अहमापत्सु चापि त्वां मोक्षय़ामि पुनः पुनः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति