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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
पुरःसरो ममाद्यास्तु भीमः शस्त्रभृतां वरः |  २५   क
एवमभ्यधिकः शल्याद्भविष्यामि महामृधे ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति