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उद्योग पर्व
अध्याय १६
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वृहस्पतिरु उवाच
तेजोहरं दृष्टिविषं सुघोरं; मा त्वं पश्येर्नहुषं वै कदाचित् |  २६   क
देवाश्च सर्वे नहुषं भय़ार्ता; न पश्यन्तो गूढरूपाश्चरन्ति ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति