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उद्योग पर्व
अध्याय १६
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शल्य उवाच
ते वै समागम्य महेन्द्रमूचु; र्दिष्ट्या त्वाष्ट्रो निहतश्चैव वृत्रः |  २८   क
दिष्ट्या च त्वां कुशलिनमक्षतं च; पश्यामो वै निहतारिं च शक्र ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति