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कर्ण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
ततो धनुर्ज्या सहसातिकृष्टा; सुघोषमाच्छिद्यत पाण्डवस्य |  ३२   क
तस्मिन्क्षणे सूतपुत्रस्तु पार्थं; समाचिनोत्क्षुद्रकाणां शतेन ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति