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शान्ति पर्व
अध्याय ८३
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मुनिरु उवाच
यथाश्रित्य महावृक्षं कक्षः संवर्धते महान् |  ४७   क
ततस्तं संवृणोत्येव तमतीत्य च वर्धते ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति