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भीष्म पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
जृम्भमाणं महासिंहं दृष्ट्वा क्षुद्रमृगा यथा |  ४३   क
धृष्टद्युम्नमुखाः सर्वे समुद्विविजिरे मुहुः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति