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वन पर्व
अध्याय १५७
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वैशम्पाय़न उवाच
ते शरैः क्षतसर्वाङ्गा भीमसेनभय़ार्दिताः |  ५०   क
भीममार्तस्वरं चक्रुर्विप्रकीर्णमहाय़ुधाः ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति