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द्रोण पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
व्राह्मणांस्तर्पय़ित्वा च निष्कान्दत्त्वा पृथक्पृथक् |  २६   क
गाश्च वासांसि च पुनः समाभाष्य परस्परम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति